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Monday, April 9, 2018

सफलता के सफर की मंजिल | Journey towards success

office cabin

       शर्मा जी एक बैंक में कैशियर के पद पर कार्य करते थे | उनका एक छोटा सा सुखी परिवार था | उन्हें जीवन से सिर्फ एक ही शिकायत थी कि वह जीवन में अधिक सफल नहीं हो पाए |  उनकी यह हार्दिक इच्छा थी कि उनका बेटा संजय जीवन में उन से कहीं अधिक सफल हो | उनके जीवन में जो कमियां और अभाव रहे वह बेटे के जीवन में न रहे | यही  सोचकर उन्होंने बेटे को इंजीनियरिंग की शिक्षा पाने के लिए सबसे अच्छे और प्रतिष्ठित  कॉलेज में दाखिला दिलवाया था | इस कॉलेज की फीस शर्मा जी की सामर्थ्य से कहीं अधिक थी | लेकिन बेटे के सुनहरी भविष्य की कामना से शर्मा जी ने अपनी हर जरूरत और ख्वाहिश का गला घोंट दिया था |




       शर्मा जी की मेहनत रंग लाई | संजय बहुत ही अच्छे नंबरों से इंजीनियरिंग की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ था | इंजीनियरिंग के बाद शर्मा जी ने किसी प्रकार बैंक से कर्ज की व्यवस्था करके संजय को MBA भी करवा दी थी | संजय ने कुछ वर्ष नौकरी की | उसकी योग्यता और अच्छी नौकरी के कारण उसकी एक अच्छी लड़की से शादी भी हो गई थी | कुछ समय कम्पनी में अनुभव प्राप्त करने के बाद संजय ने अपना व्यवसाय आरम्भ कर लिया था |


       व्यवसाय में अच्छी सफलता मिलने के कारण संजय ने एक बड़ी कम्पनी बना ली थी | आज इस कम्पनी का उद्घाटन हो रहा था | संजय अपनी पत्नी, बच्चों और पिता शर्मा जी के साथ कम्पनी में पहुंचा | शर्माजी ने देखा कि कम्पनी वास्तव में बढ़ी लग रही थी | कम्पनी के अधिकारियों और कर्मचारियों ने पूरे परिवार का स्वागत किया  | उसके बाद सभी संजय के लिए बनाये गए कमरे में गए | यह कमरा आलीशान लग रहा था | महंगी आलीशान बड़ी सी मेज और कुर्सी के अतिरिक्त  सोफे, कंप्यूटर अदि की भी व्यवस्था थी | शर्मा जी को यह सब देखकर बहुत ही खुशी हुई |

father advising his son
       शर्मा जी ने  बेटे संजय को उसकी कुर्सी पर बिठाया और उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया |   शर्मा जी ने बेटे से पूछा कि आज सबसे ज्यादा सौभाग्यशाली कौन है | संजय ने उत्तर दिया कि आज सबसे ज्यादा सौभाग्यशाली मैं स्वयं को मानता हूं |  शर्मा जी  थोड़ा हैरान थे उन्हें आशा थी  बेटा इस सफलता में  उनके योगदान की भी बात करेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ |

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       कुछ देर के बाद संजय अपने पिता और पूरे परिवार को लेकर एक दूसरे कमरे में गया | यह कमरा संजय के कमरे से बहुत बड़ा और उससे भी अधिक आलीशान था | संजय ने शर्मा जी का हाथ पकड़कर कहा पापा यह आपका ऑफिस है और उन्हें उस कमरे की भव्य कुर्सी पर बिठा दिया | संजय ने अपने पिता के चरण स्पर्श करते हुए कहा कि यह सफलता आपकी मेहनत और त्याग के कारण ही संभव हो पाई है | मैं बहुत ही सौभाग्यशाली हूं कि मुझे आप जैसे पिता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ | शर्मा जी को बेटे की सफलता में ही अपनी सफलता दिखाई दे रही थी | शर्मा जी को सफलता के सफर की मंजिल मिल गई थी |

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