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Saturday, March 24, 2018

तुम न जाने किस जहां में खो गए | Best emotional motivational story

       आज रविवार का दिन था | सरकारी कार्यालय की छुट्टी होने के कारण संजय घर में बैठकर अखबार पढ़ रहा था | इतने में उसका तीन  साल का बेटा हाथ में कुछ लेकर कमरे में प्रविष्ट हुआ | संजय ने ध्यान से देखा यह तो उसके स्वर्गीय पिता की डायरी थी | उसने डायरी बेटे के हाथ से ले ली | समय व्यतीत करने के लिए वह डायरी के पन्ने पलटने लगा |

       अचानक एक पेज को पढ़कर उसकी आंखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा | उसे याद आने लगा जब वह केवल चार-पांच वर्ष का था तो उसके पिता उसे और उसकी मां को समुद्री जहाज से कहीं घुमाने के लिए ले गए थे | यात्रा के दौरान दुर्घटनावश जहाज डूबने की स्थिति बन गई थी | डूबते हुए जहाज में से सभी सवारियों को लाइफ बोट में शिफ्ट किया जा रहा था | अंत में जब उसके माता-पिता का नंबर आया तो जहाज के कप्तान ने बताया कि लाइव बोट में केवल एक सवारी के लिए ही स्थान बचा है | पिता ने संजय को  गोद में उठाया हुआ था | पिता ने कुछ देर सोचा और उसके बाद बिल्कुल डूबने के कगार पर जहाज में पत्नी को छोड़ कर खुद बेटे के साथ लाइफ बोट में बैठ गया | लाइट बोट में बैठते ही जहाज पानी में उसकी बेबस आँखों से देखती मां के साथ डूब गया था | मैं मां-मां कह कर रोता ही रह गया था |


       उस दुर्घटना के बाद पिता ने अपनी फौज की नौकरी छोड़ दी थी | वह घर में रह कर अपने बेटे संजय की परवरिश करने लगे | अपने हाथों से संजय के लिए तीनों समय का खाना  बनाते  थे | अपने हाथों से ही उसके कपड़े धोने से लेकर उसका हर छोटा मोटा काम करते  थे | अब मानो पिता की सारी दुनिया बेटे तक सीमित होकर रह गई | पिता ने दोबारा शादी करने का भी कभी विचार नहीं किया | संजय ने कई बार अपने पिता को अपनी मां की फोटो के सामने भरी आंखों से बैठे हुए देखा था | संजय ने कई बार अपने पिता को अपनी मां की फोटो के सामने भरी आंखों से बैठे हुए देखा था |



       समय तेजी से आगे बढ़ता गया | संजय अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद एक अच्छी सी नौकरी करने लगा था | पिता ने उसकी एक सुंदर और सुशील कन्या से शादी भी करवा दी थी | एक साल के बाद संजय के घर में एक बेटा भी पैदा हो गया था | बेटे की बेरुखी और पत्नी के बिछड़ने के गम के कारण पिता का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा था | और एक दिन वह दुनियां को छोड़कर चले गए | पिता की मृत्यु पर संजय को कोई खास दुख नहीं हुआ था |



       डायरी के उस पेज पर जहाज की दुर्घटना का वर्णन किया हुआ था |  डायरी में लिखा हुआ था कि मां को कैंसर हो गया था | डॉक्टरों के अनुसार उसके जीवन के कुछ दिन ही शेष रह गए थे | डायरी में कुछ कैंसर की पुष्टि होने की रिपोर्टें भी पड़ी हुई थी | आगे लिखा था की फौजी और पति होने के कारण अपनी पत्नी को ही बचाना मेरा धर्म था, लेकिन उसके पास जीवन के नाम पर मात्र कुछ दिन ही शेष बचे थे | इसलिए बेटे की परवरिश को ध्यान में रखकर मुझे जीवन का एक कठिन निर्णय लेना पड़ा | एक अन्य पेज पर लिखा था पत्नी तो एक बार मर गई लेकिन मैं स्वयं को दोषी मानते हुए कई बार मरा हूं |

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