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Tuesday, March 6, 2018

जैसे कर्म करेगा, वैसे फल देगा भगवान | as you sow so shall you reap


       एक संत थे वह हर समय सेवा और सिमरन करने में ही व्यस्त रहते थे | अधिकांश समय वह दीन-दुखियों और गरीबों की सेवा करते रहते थे | उनके लिए प्राणियों की सेवा करना भगवान की सेवा करने के समान था | जब सेवा के कार्यों से समय मिलता था, तो वह भगवान की साधना में लीन हो जाते थे | उनका जीवन इसी प्रकार चल रहा था जिससे वह परम संतुष्ट थे |



        एक दिन उन्हें नारद मुनि मिलते हैं | उनके हाथ में एक बहुत बड़ा बही खाता होता है | संत ने पूछा कि यह क्या है | नारद जी ने उत्तर दिया कि यह उन प्रभु भक्तों की सूची है जो भगवान से प्रेम करते हैं | ऐसा सुनकर संत जी की  उस सूची को देखने की उत्सुकता बढ़ गई | उन्होंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए नारद मुनि जी से पूछा कि क्या इसमें मेरा भी नाम है | नारद जी ने सारा बही खाता शुरू से लेकर अंत तक भली प्रकार से जांचा, लेकिन संत जी का नाम उसमें नहीं था | संत जी को आशा थी कि उनके श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार उनका  नाम इस सूची में अवश्य होना चाहिए | वह परोपकार एवं सेवा भावना से कार्य कुछ पाने की अभिलाषा से नहीं कर रहे थे, लेकिन फिर भी यह सूची देखकर संत को गहरा आघात लगा |  कुछ समय के बाद वह यह सब भूल कर पुनः अपने शुभ  कर्मों की दिनचर्या  में व्यस्त हो गए |


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       कुछ दिनों के पश्चात संत जी की नारद मुनि जी से पुनः भेंट हुई | इस बार उनके हाथ में पहले से छोटा  एक बही खाता था | संत जी के बिना पूछे ही नारद मुनि जी ने बताया कि यह उन भक्तों की सूची है, जिन्हें भगवान स्वयं प्रेम करते हैं | यह सुनकर संत जी को पिछली बार देखी हुई सूची की याद आ गई, जिसे देखकर उन्हें निराशा हुई थी  | इस बार संत जी ने सूची देखने की कोई उत्सुकता प्रकट नहीं की | नारद मुनि जी ने संत से कहा कि क्या आप यह सूची नहीं देखोगे ? संत जी के लिए यह एक असमंजस की स्थिति थी | वह निरुत्तर से हो गए थे | संत ने अनमने भाव से कहा दिखा दीजिए | जब सूची का प्रथम पृष्ठ खोला गया तो उसमें सबसे पहले संत जी का नाम था | नारद जी ने कहा कि भगवान आप के श्रेष्ठ कर्मों के कारण  आपसे बहुत प्रेम करते हैं, इसीलिए सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है | इतना सुनते ही संत जी भाव विह्वल हो गए | उनकी आंखों से अविरल अश्रु धारा बहने लगी | वह परम् पिता भगवान को अपने प्रति विशेष स्नेह भाव रखने के लिए बार-बार धन्यवाद करने लगे |

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       इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि श्रेष्ठ कर्म किए जाएं तो भगवान उनका श्रेष्ठ फल ही देते हैं | यदि कर्मों का फल मिलने में विलंब हो रहा है तो इसका अर्थ प्रभु की ओर से न नहीं है बल्कि प्रभु श्रेष्ठ फल देने के लिए उसकी रचना कर रहे हैं | इसलिए अपने प्रत्येक कर्म को प्रभु को समर्पित करते हुए, अच्छे भाव से ही करना चाहिए |

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