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Thursday, February 22, 2018

जीवन में अपनों से आगे बढ़ने की चाह में, अपनों से ही दूर हो गए || In the desire to move forward in life, we get away from our own

     जीवन में अति महत्वाकांक्षी बनकर क्या खुशियां मिल पाती हैं ? कई बार सुख-सुविधाएं तो मिल जाती हैं,  लेकिन उसके लिए जीवन की  खुशियों की कीमत चुकानी पड़ती है |




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       महेश का जीवन सुख पूर्वक बीत रहा था | वह एक सरकारी कार्यालय में अच्छे पद पर कार्यरत था | उसके खुशियों भरे परिवार में उसकी पत्नी एक बेटी और एक बेटा ही थे | बेटे राजेश को जीवन में अपने से भी ज्यादा सफल बनाने की अभिलाषा से उसने इंजीनियरिंग में दाखिला दिलवाया था | आज राजेश का अंतिम  सेमेस्टर की परीक्षा का  परिणाम आया था |  वह अच्छे अंक लेकर इंजीनियरिंग की परीक्षा में सफल हुआ था | आज महेश फूला नहीं समा रहा था | उनके खानदान में पहली  बार कोई इंजीनियर बना था | वह स्वयं  को गौरवान्वित महसूस कर रहा था |

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       कॉलेज में आठवें  सेमेस्टर की पढ़ाई के दौरान ही  विभिन्न कंपनियां भर्ती के लिए कॉलेज में आई थी | राजेश का चयन एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में पहले ही हो चुका था |  परीक्षा पूर्ण करते ही राजेश ने उस कंपनी में नौकरी शुरू कर दी | कुछ समय के बाद एक विदेश में स्थित कंपनी की ओर से राजेश को विदेश में नौकरी करने का प्रस्ताव मिला | उसने इस विषय में घर में चर्चा की | इस कंपनी में राजेश को दो लाख रूपये प्रतिमाह वेतन मिलना था | महेश की पत्नी पुत्र मोह की वजह से राजेश के विदेश में नौकरी करने के पक्ष में नहीं थी | महेश को अपने पुत्र राजेश  के उज्जवल भविष्य के लिए विदेश में नौकरी करना उचित लगा | अपने करीबियों से ऊपर उठने की इच्छा भी इस निर्णय में निहित थी | जल्द ही राजेश नौकरी करने विदेश चला गया |
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       समय जैसे पंख लगाकर तेजी से उड़ने लगा | महेश ने अपनी बेटी का विवाह दिल्ली के ही एक सरकारी अधिकारी से कर दिया | राजेश को भी विदेश में नौकरी करते हुए दो-तीन साल हो गए थे | उसका भी एक भारतीय कन्या से विवाह सम्पन्न कर दिया गया | महेश अब रिटायर हो चुका था | महेश को रिटायर होने के बाद पेंशन मिल रही थी, जो कि उसके मासिक खर्चों के लिए पर्याप्त थी | इसलिए राजेश के कभी कभार पूछने पर भी उसने कभी राजेश से पैसे नहीं लिए थे | कुछ ही वर्षों में राजेश के घर में भी एक पुत्र और एक पुत्री ने जन्म लिया अब  राजेश का भारत आना कम हो गया था | इससे पहले वह साल में एक बार भारत में अवश्य आता था जबकि फोन पर तो प्रायः रोज ही बात हो जाती थी |

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        एक दिन महेश को राजेश का फोन आया कि वह विदेश में ही अपने रहने के लिए एक मकान खरीदना चाहता है जिससे कि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके | मकान खरीदने के लिए राजेश के पास पैसे कम पड़ रहे थे | महेश सोचने लगा कि बेटे का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उसे अपने भविष्य की सुरक्षा को दांव पर लगाना पड़ेगा | महेश ने सारा जीवन पाई-पाई करके जमा की गई  पूंजी का अधिकांश भाग राजेश को मकान खरीदने के लिए भेज दिया | वह समझ नहीं पा रहा था कि बेटे के विदेश में घर  खरीद लेने की उपलब्धि पर वह खुश हो या दुखी | इसका कारण यह था कि मकान खरीदने के बाद तो बेटे की भारत वापसी की आशा ही समाप्त सी होने लगी थी |

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       तीन साल की लम्बी अवधि के बाद राजेश अपने परिवार के साथ भारत 20 दिन की छुट्टी लेकर आया था | भारत आते ही पहले वह अपने ससुराल चला गया था | उनके परिवार के विवाह समारोह में शामिल होकर 5 दिन बाद राजेश घर पहुंचा था | महेश और उसकी पत्नी के जीवन में जैसे फिर से बहार सी आ गई थी | बच्चों के आने से उसका घर खुशियों से भर गया था | यह दम्पति इन खुशियों को अभी अपने दामन में समेट भी नहीं पाए थे कि बच्चों की तबियत यहां के मौसम के कारण बिगड़ने लगी | बहू का मूड भी ससुराल में इतनी अधिक आवभगत के बावजूद भी बिगड़ने लगा था | दो दिन बाद ही बेटे ने अगले दिन की अपनी वापसी करने की बात बताकर चौंका दिया | वह बेटे को हमेशा के लिए भारत वापस आकर बसने की बात अभी कह भी नहीं पाया था | वह उसे कहना चाहता था कि 'अपने घर में भी है रोटी'  | वह जीवन में अपनों से आगे बढ़ने की चाह में, अपनों से ही दूर हो गया था |


       आज बच्चे वापस जा रहे थे महेश और उसकी पत्नी उन्हें छोड़ने हवाई अड्डे पर आये हुए थे | माता पिता से विदा लेते हुए चरण स्पर्श करने के बाद बेटे ने अगले साल आने का आश्वासन दिया | महेश जीवन की इस संध्या वेला में अब तो ऐसे कच्चे केले भी नहीं खरीदता था जो की कल पककर खाने लायक तैयार  होने हों | महेश सोचने लगा कि बेटे को जीवन में दोबारा देखने की हसरत क्या पूरी हो पायेगी | बेटा अगली बार मुझसे मिलने आएगा या  मुझे  हरिद्वार में प्रवाहित करने आएगा | महेश इन सोचों में उलझा ही  हुआ था कि  बेटे का जहाज उड़ने  और नजरों से ओझल होने लगा | जहाज के साथ ही उसके जिगर का टुकड़ा भी हो रहा था उससे दूर,  दूर,  दूर...

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