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Monday, February 19, 2018

अरुणिमा सिन्हा : भारत के लिए बनाया एक अटूट विश्व कीर्तिमान || Arunima Sinha - first Indian Divyang to climb Mount Everest

       सफलता के शिखर पर वही पहुंचते हैं जिन्होंने जीवन में बड़े सपने देखे होते हैं | यदि ऊंचे सपने देखने वाली सोच न हो,  तो जीवन में महान सफलता प्रकट ही नहीं हो सकती | मनुष्य में जितना साहस होता है उसी के अनुसार उसके इरादों की मजबूती होती है, जिसके परिणामस्वरूप वह जीवन में सफलता प्राप्त करता है | बड़े सपनों के बीज बौने से ही,  उन पर महान सफलता के फल लग सकते हैं | बड़े सपने देखना महान सफलता प्राप्त करने की ओर पहला कदम होता है |




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अरुणिमा सिन्हा का आरंभिक जीवन / Early life of Ms. Arunima Sinha  :  अरुणिमा सिन्हा का जन्म 1988 में शहजादपुर, जिला अंबेडकर नगर, उत्तरप्रदेश में हुआ था | यह एक लंबे और खिलाड़ियों जैसे  मजबूत शरीर वाली लड़की थी | बचपन में ही इनके  पिता का निधन हो गया था | इन्हें बचपन से ही  बॉलीबाल  खेलने का शौक था | अपनी मेहनत और खेल के प्रति समर्पित भावना के कारण ही यह स्कूल से राष्ट्रीय स्तर तक की बॉलीबाल खिलाड़ी बनी |


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जीवन की दिशा बदलने वाले पल / Turning point of life  :  अरुणिमा अपने उज्जवल भविष्य की ओर तेजी से बढ़ रही थी | लेकिन तभी एक ऐसी दुखद हृदय विदारक घटना हो गई जिसने उसके जीवन में एक भूचाल ला दिया | वह सी आई एस एफ में नौकरी प्राप्त करने की प्रक्रिया के तहत घर से दिल्ली की ओर पद्मावती एक्सप्रेस में रेल यात्रा कर रहे थी | तभी अचानक रेल में हथियारबंद लुटेरे आ गए  उन्होंने यात्रियों को आतंकित कर के उनसे  धन और आभूषण लूटने आरंभ कर दिए | लुटेरों के आतंक के कारण किसी भी यात्री द्वारा विरोध करने का साहस नहीं किया गया | लुटेरों ने अरुणिमा की सोने की चेन और पर्स लूटने का प्रयास किया | अरुणिमा ने इसका डटकर विरोध किया | लुटेरे एक लड़की से  पराजित हो रहे थे | लूटने में असमर्थ रहने के कारण झुँझलाहट  में  वह इस सीमा तक आग बबूला हो गए कि,  उन्होंने अरुणिमा को चलती  रेलगाड़ी  से बाहर फेंक दिया | अरुणिमा की रेलगाड़ी के नीचे आने के कारण टांग कट गई और वह पटरियों पर पड़ी कराहती रही | अरुणिमा का  दिल्ली के एम्स अस्पताल में लम्बे समय तक  इलाज   चला  | डाक्टर  अरुणिमा की जीवन की रक्षा करने में तो सफल हुए लेकिन वह अपनी एक टांग गंवा  चुकी थी |  डॉक्टरों ने  कृत्रिम टांग लगा दी |
सफलता के शिखर की ओर बढ़ने की यात्रा || Journey towards the paramount of success  :  जीवन की इस भयानक त्रासदी से भविष्य के सुनहरे सपने चूर चूर हो गए थे | एक उड़ने वाले परिंदे के मानो पंख ही कट गए थे | एक खिलाड़ी के लिए विकलांग होने से बड़े दुःख की कल्पना ही नहीं की जा सकती | सभी परिचित अरुणिमा का खिलाड़ी के तौर पर भविष्य समाप्त मानकर उसे सांत्वना दे रहे थे | ऐसे निर्णायक पलों में अरुणिमा ने अपना मनोबल कमजोर नहीं होने दिया और उसे स्वयं ही बढ़ाकर बुलंदियों तक पहुँचाया | यह सत्य है की मनुष्य जब पक्का इरादा कर लेता है,  तो उसी पल से वह निर्बल से सबल बन जाता है |  उसने राष्ट्रीय ही  नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ बड़ा करने का निर्णय लेते हुए, हिमालय के शिखर पर चढ़कर भारत का झंडा फहराने का निर्णय लिया | मानसिक रूप से वह तैयार थी शारीरिक रूप से भी उसने अपने को तेजी से इस महान उद्देश्य को पूरा करने  के लिए  तैयार करना शुरू किया | वह भारत की पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्री  पाल जिसने हिमालय के शिखर तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की थी, से मिली और उन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया | बछेंद्री पाल ने इस निर्णय को आत्मघाती बताया तथा मार्ग की बाधाएं बताते हुए पुनः विचार करने के लिए कहा | लेकिन अरुणिमा के दृढ़ निश्चय को देखकर अपना आशीर्वाद उसे दे दिया | बछेंद्री पाल की निगरानी में ही अरुणिमा ने पर्वतारोहण का कठिन प्रशिक्षण लिया | अपना प्रशिक्षण पूरा करके 31 मार्च 2013 को अरुणिमा ने अपनी एवरेस्ट की ऐतिहासिक  चढ़ाई आरम्भ की | परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल थी कि एक प्रकार से नदी के बहाव की विपरीत दिशा में चुनौतीपूर्ण संघर्ष करके तैरने के समान यह पर्वतारोहण का कार्य था | कल्पना कीजिए कि इस मजबूत इरादों वाली महिला को  सफलता का तिरंगा फहराने के लिए नकली टांग के साथ कितनी असहनीय पीड़ा का सामना करना पड़ा होगा | दुर्गम पहाड़ियों, बर्फीले तूफानों और कठिन रास्तों को लांघते हुए वह 52 दिनों की कठिन यात्रा को पूरा करने के बाद 31 मई 2013 को एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचकर भारत का झंडा फहराने में कामयाब हुई | इस प्रकार वह एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करने वाली  विश्व की प्रथम दिव्यांग महिला पर्वतारोही बनने का गौरव प्राप्त कर सकी | अपनी असाधारण सफलता को प्राप्त करके ही अरुणिमा संतुष्ट होकर नहीं बैठ गई,  अपितु उसने अपनी आकांक्षाओं को और विराट रूप देते हुए,  विश्व के बाकि बचे छह महाद्वीपों के पर्वतों के उच्चतम  शिखरों पर भारत का तिरंगा फहराने का संकल्प किया |

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       अरुणिमा सिन्हा का इंटरव्यू / Interview of Arunima Sinha :  एक साक्षात्कार में अरुणिमा सिन्हा से पूछा गया कि आपके पैर अधिक  मजबूत हैं  या आपका हौसला अधिक मजबूत है,  आप  एवरेस्ट के शिखर तक पहुंचने का श्रेय किसको देती  हैं |  तो उन्होंने कहा कि यह सफलता मजबूत पैरों के कारण नहीं मजबूत हौसलों के कारण प्राप्त हुई है | वास्तव में सोचने पर उनकी कही हुई यह  बात सत्य प्रतीत होती है क्योंकि मजबूत पैर तो  बहुत से इंसानों के हैं लेकिन इतने मजबूत हौसले हर इंसान के नहीं होते |
       पुरस्कार एवं सम्मान / Awards  :  अरुणिमा सिन्हा की इस महान उपलब्धि पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने उन्हें सम्मानित किया तथा 25 लाख रुपए का चेक प्रदान किया | देश के महान पुरस्कारों में से एक पदम श्री पुरस्कार से उन्हें वर्ष 2015 में सम्मानित किया गया | एक असम्भव सा प्रतीत होने वाला कार्य करके उन्होंने प्रमाणित कर दिया कि वह वास्तव में भारत की  एक लौह इच्छशक्ति वाली  महिला हैं |

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       समाज कल्याण के लिए कार्य / Work towards social welfare  :  सकारात्मक प्रेरणा जीवन में अति आवश्यक है, योग्यतम व्यक्ति को भी प्रेरणा का अभाव पीछे खींच ले जाता है | अरुणिमा सिन्हा ने जीवन में प्रत्येक हारे हुए लेकिन महत्वाकांक्षी दिव्यांग का सहारा बनने के उद्देश्य से तथा समाज कल्याण की भावना से शहीद चंद्रशेखर आजाद दिव्यांग खेल एकेडमी (Shaheed Chandra Shekhar Azad Divyang Khel Academy) की स्थापना की है | जिसे अरुणिमा फाउंडेशन (Arunima Foundation ) द्वारा संचालित किया जा रहा  है | इसमें दिव्यांग खिलाड़ियों को प्रशिक्षित तथा प्रोत्साहित किया जाता है तथा उन्हें सभी प्रकार की  सुविधाएं प्रदान की जाती है | यह  एकेडमी दिव्यांग खिलाड़ियों को सम्मान पूर्वक शारीरिक और सामाजिक विकास में सहायता प्रदान करती  हैं | साधारणतः  प्रत्येक खिलाड़ी की यह अभिलाषा होती है कि उसका कीर्तिमान कोई न तोड़  पाए | लेकिन अरुणिमा की  यह महान सोच है  कि उनका कीर्तिमान  भारतीय दिव्यांग पर्वतारोही ही तोड़कर नए इतिहास की रचना करें |
       अरुणिमा का  संघर्ष एवं चुनौती पूर्ण जीवन तथा उससे प्राप्त सफलता एक प्रकाश स्तंभ की तरह है जो प्रत्येक दिव्यांग, नारी तथा इंसान को प्रेरणा देकर सफलता की राह दिखाता है | अरुणिमा को यदि लौह इच्छशक्ति वाली  महिला  कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी | अरुणिमा की जीवनी को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए,  जिससे एक ओर अरुणिमा सिन्हा को पर्याप्त सम्मान मिल पाएगा जिसकी वह अधिकारी हैं तो दूसरी ओर इससे देश का प्रत्येक बच्चा उनके महान जीवन से प्रेरणा ले सकेगा  |

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